+ शिवार्थी के लिए जन-सम्पर्क व्यर्थ -
पार्श्ववर्त्यंगिना नास्ति केनचिन्मे प्रयोजनं ।
मित्रेण शत्रुणा मध्यवर्त्तिना ता शिवार्थिनः ॥2॥
अति निकटवर्ती मित्र शत्रु, मध्यगत से नहिं मुझे ।
कुछ प्रयोजन मैं मोक्ष इच्छुक, नहिं सहायक ये मुझे ॥१६.२॥
अन्वयार्थ : मैं शिवार्थी हूँ, अपने आत्मा को निराकुलतामय सुख का आस्वाद कराना चाहता हूँ; इसलिए मुझे शत्रु, मित्र और मध्यस्थ - किसी भी पास में रहनेवाले जीव से कोई प्रयोजन नहीं है; अर्थात् पास में रहनेवाले जीव, मित्र, शत्रु और मध्यस्थ - सब मेरे कल्याण के बाधक हैं ।