
इंदोर्वृद्धौ समुद्रः सरिदमृतबलं वर्द्धते मेघवृष्टे-
र्मोहानां कर्मबंधो गद इव पुरुषस्याभुक्तेरवश्यं ।
नानावृत्ताक्षराणामवनिवरतले छंदसां प्रस्तरश्च
दुःखौघागो विकल्पास्त्रववचनकुलं पार्श्ववर्यगिनां हि ॥3॥
ज्यों चन्द्र से सागर सरित जल मेघ वर्षा से करम ।
बन्धन विकारों से, अपक्वाहार से रोगादि सब ॥
बहु विविध छन्दों अक्षरों से काव्य कोश सदा बड़ें ।
त्यों निकटवर्ती जनों से, बहु दुख वचन चिन्ता बड़ें ॥१६.३॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार चन्द्रमा के सम्बन्ध से समुद्र, वर्षा से नदी का जल, मोह के सम्बन्ध से कर्म-बन्ध, कच्चे भोजन से पुरुषों के रोग और नाना प्रकार के छन्द के अक्षरों से शोभित छन्दोंके सम्बन्ध से प्रस्तार वृद्धित होते हैं; उसी प्रकार पार्श्ववर्ती जीवों के सम्बन्ध से नाना प्रकार के दु:ख और विकल्पमय वचनों की वृद्धि होती है ।