वृद्धिं यात्येधसो वन्हिर्वृद्धौ धर्मस्य वा तृषा ।
चिन्ता संगस्य रोगस्य पीडा दुःखादि संगतेः ॥4॥
ज्यों अनल ईन्धन से तृषा बहु धूप से परिग्रहों से ।
चिन्ता बड़े पीड़ा बिमारी से दुखादि संग से ॥१६.४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार ईंधन से अग्नि की, धूप से प्यास की, परिग्रह से चिन्ता की और रोग से पीड़ा की वृद्धि होती है; उसी प्रकार प्राणियों की संगति से पीड़ा और दु:ख आदि सहन करने पड़ते हैं ।