
तपसां बाह्य भूतानां विविक्तशयनासनं ।
महत्तपो गुणोद्भूतेरागत्यागस्य हेतुतः ॥6॥
सब बाह्य तप में है बड़ा, सु विविक्त शयनासन कहा ।
इससे गुणों की प्रगटता, रागादि सब मिटते सदा ॥१६.६॥
अन्वयार्थ : बाह्य तपों में विविक्त-शयनासन तप को महान तप बतलाया है; क्योंकि इसके आराधन से आत्मा में गुणों की प्रगटता होती है और मोह का नाश होता है ।