+ मूर्छा -
काचिच्चिंता संगतिः केनचिच्च रोगादिभ्यो वेदना तीव्रनिद्रा ।
प्रादुर्भूतिः क्रोधमानादिकानां मूर्च्छा ज्ञेया ध्यानविध्वंसिनी च ॥7॥
हो किसी की चिन्ता किसी की संगति रोगादि से ।
पीड़ा अति निद्रा प्रगट हों कषायें क्रोधादि ये ॥
हैं ये सभी मोहातिवर्धक, मूर्छा जानों यही ।
यह ध्यान की विध्वंसिनी, इससे सदा बचते सुधी ॥१६.७॥
अन्वयार्थ : स्त्री, पुत्र आदि की चिन्ता, प्राणियों के साथ संगति, रोग आदि से वेदना, तीव्र निद्रा और क्रोध, मान आदि कषायों की उत्पत्ति होना, मूर्च्छा है और इस मूर्च्छा से ध्यान का सर्वथा नाश होता है ।