+ मुक्ति-हेतु ध्यान के कारण -
संगत्यागो निर्जनस्थानकं च
तत्त्वज्ञानं सर्वचिंताविमुक्तिः ।
निर्बाधत्वं योगरोधो मुनीनां
मुक्त्यै ध्याने हेतवोऽमी निरुक्ताः ॥8॥
सब संग तज एकान्त थल, तत्त्वज्ञ सब चिन्ता रहित ।
निर्बाधता मन वचन तन वश, मुक्ति हेतु ध्यान नित ॥१६.८॥
अन्वयार्थ : बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग, एकान्त स्थान, तत्त्वों का ज्ञान, समस्त प्रकार की चिन्ताओं से रहितपना, किसी प्रकार की बाधा का न होना और मन, वचन तथा काय को वश करना - ये ध्यान के कारण हैं । इनका आश्रय करने से मुनियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है ।