
विकल्पपरिहाराय संगं मुंचंति धीधनाः ।
संगतिं च जनैः सार्द्धं कार्यं किंचित् स्मरंति न ॥9॥
सब विकल्पों से मुक्त होने, संग छोड़ें धीधनी ।
जन संगति कुछ कार्य आदि, नहीं सोचें निज रती ॥१६.९॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य बुद्धिमान हैं, स्व और पर के स्वरूप के जानकार होकर अपने आत्मा का कल्याण करना चाहते हैं; वे संसार के कारण-स्वरूप विकल्पों का नाश करने के लिए बाह्य-अभ्यन्तर - दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग कर देते हैं; दूसरे मनुष्यों की संगति और किसी कार्य का चिन्तन भी नहीं करते हैं ।