
वृश्चिका युगपत्स्पृष्टाः पीडयंति यथांगिनः ।
विकल्पाश्च तथात्मानं तेषु सत्सु कथं सुखं ॥10॥
ज्यों एक साथ अनेक बिच्छु, तन सदा पीड़ित करें ।
त्यों विकल्पों से आतमा, है दुखी सुख नहिं स्वप्न में ॥१६.१०॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार शरीर पर एक साथ लगे हुए अनेक बिच्छु प्राणी को काटते और दु:खित बनाते हैं; उसी प्रकार अनेक प्रकार के विकल्प भी आत्मा को बुरी तरह दुखाते हैं; जरा भी शान्ति का अनुभव नहीं करने देते; इसलिए उन विकल्पों की मौजूदगी में आत्मा को कैसे सुख हो सकता है? विकल्पों के जाल में फँसकर यह जीव रत्ती भर भी सुख का अनुभव नहीं कर सकता ।