+ सुखी होने का उपाय -
बाह्यसंगतिसंगस्य त्यागे चेन्मे परं सुखं ।
अंतः संगतिसंगस्य भवेत् किं न ततोऽधिकं ॥11॥
जब बाह्य संगति संग तजने से बहुत सुख है मुझे ।
तब भीतरी संग संगति तज दें तो उत्तम सुख मुझे ॥१६.११॥
अन्वयार्थ : जब मुझे बाह्य संगति के त्याग से ही परम सुख की प्राप्ति होती है, तब अन्तरंग संगति के त्याग से तो और भी अधिक सुख मिलेगा ।