
बाह्यसंगतिसंगेन सुखं मन्यते मूढधीः ।
तत्त्यागेन सुधीः शुद्धचिद्रूपध्यानहेतुना ॥12॥
नित बाह्य संगति संग से, सुख मानते हैं अज्ञ ही ।
सब छोड़ शुद्ध चिद्रूप, निज का ध्यान सुख मानें सुधी ॥१६.१२॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष मुग्ध हैं, अपना-पराया जरा भी भेद नहीं जानते; वे बाह्य पदार्थों की संगति से अपने को सुखी मानते हैं; परन्तु जो बुद्धिमान हैं, तत्त्वों के भले प्रकार वेत्ता हैं, वे यह जानकर कि संगति का त्याग ही शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान में कारण है, उसके त्याग से ही शुद्ध-चिद्रूप का ध्यान हो सकता है; बाह्य पदार्थों का सहवास न करने से ही अपने को सुखी मानते हैं ।