
ते वंद्याः गुणिनस्ते च ते धन्यास्ते विदांवराः ।
वसंति निर्जने स्थाने ये सदा शुद्धचिद्रताः ॥14॥
निज शुद्ध चिद्रूप में निरत, जो इसी हेतु एकान्त में ।
रहते गुणी वे धन्य, विद्वत् शिरोणि आत्मस्थ हैं ॥१६.१४॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य शुद्ध-चिद्रूप में अनुरक्त हैं और उसकी प्राप्ति के लिए निर्जन स्थान में निवास करते हैं; संसार में वे ही वन्दनीक, सत्कार के योग्य, गुणी, धन्य और विद्वानों के शिरोणि हैं; अर्थात् उत्तम पुरुष उन्हीं का आदर-सत्कार करते हैं और उन्हें ही गुणी, धन्य और विद्वानों में उत्तम मानते हैं ।