+ ज्ञानियों की प्रवृत्ति -
निर्जनं सुखदं स्थानं ध्यानाध्ययनसाधनं ।
रागद्वेषविमोहानां शातनं सेवते सुधीः ॥15॥
है राग द्वेष विमोह नाशक, ध्यान अध्ययन सहायक ।
निर्जन सुखद स्थान का, आश्रय करें नित सुधी जन ॥१६.१५॥
अन्वयार्थ : यह निर्जन स्थान अनेक प्रकार के सुख प्रदान करनेवाला है, ध्यान और अध्ययन का कारण है; राग, द्वेष और मोह का नाश करनेवाला है; इसलिए बुद्धिमान पुरुष अवश्य इसका आश्रय करते हैं ।