
खसुखं न सुखं नृणां किंत्वभिलाषाग्निवेदनाप्रतीकारः ।
सुखमेव स्थितिरात्मनि निराकुलत्वाद्विशुद्धपरिणामात् ॥4॥
इंद्रिय सुख सुख नहीं बस, इच्छाग्नि वेदन निवारण ।
निज निराकुल परिणति विशुद्धि से निज-स्थिति सौख्यमय ॥१७.४॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय-जन्य सुख, सुख नहीं है; किन्तु मनुष्यों की अभिलाषारूप अग्नि-जन्य वेदनाओं को नष्ट करने का उपाय है और जो अपने चिदानन्द-स्वरूप आत्मा में स्थिति का होना है, वह निराकुलतारूप और विशुद्ध परिणाम-स्वरूप होने से सुख ही है ।