
नो द्रव्यात्कीर्तितः स्याच्छुभखविषयतः सौधतूर्यत्रिकाद्वा
रूपादिष्टागमाद्वा तदितरविगमात् क्रीडनाद्यादृतुभ्यः ।
राज्यात्संराजमानात् वलवसनसुतात्सत्कलत्रात्सुगीतात्
भूषाद् भूजागयानादिह जगति सुखं तात्त्विकं व्याकुलत्वात् ॥5॥
तात्त्विक-सुख किन-किन से प्राप्त नहीं होता ह
यह नहीं धन से कीर्ति से, इंद्रिय विषय शुभ भवन से ।
तूर्यादि वाद्यों रूप इष्ट मिलन अनिष्ट वियोग से ॥
अति श्रेष्ठ क्रीड़ा ऋतु राजा, राज्य मान सुसुत तिया ।
उत्तम वसन सेना मधुर, संगीत भूषण तरु गिरा ॥
पर्वत सवारी आदि उत्तम, श्रेष्ठ साधन से नहीं ।
वे चित्त व्याकुलकर सभी, तात्त्विक निराकुल ही सुखी ॥१७.५॥
अन्वयार्थ : यह निराकुलतामय तात्त्विक सुख न द्रव्य से प्राप्त हो सकता है; न कीर्ति, इंद्रियों के शुभ विषय, उत्तम महल और गाजे-बाजों से मिल सकता है । उत्तम रूप, इष्ट पदार्थों का समागम, अनिष्टों का वियोग और उत्तमोत्तम क्रीड़ा आदि भी इसे प्राप्त नहीं करा सकते । छह ऋतु, राज्य, राजा की ओर से सम्मान, सेना, उत्तम वस्त्र, पुत्र, मनोहारिणी स्त्री, कर्ण-प्रिय गाना, भूषण, वृक्ष, पर्वत और सवारी आदि से भी प्राप्त नहीं हो सकता; क्योंकि द्रव्य आदि के सम्बन्ध से चित्त व्याकुल रहता है और चित्त की व्याकुलता, निराकुलतामय सुख को रोकनेवाली होती है ।