
पूरे ग्रामेऽटव्यां नगरशिरसि नदीशादिसुतटे
मठे दर्यां चैत्योकसि सदसि रथादौ च भवने ।
महादुर्गे स्वर्गे पथनमसि लतावस्त्रभवने
स्थितो मोही न स्यात् परसमयरतः सौख्यलवभाक् ॥6॥
मोही उस सुख को प्राप्त नहीं कर सकता है;
पुर गाँव वन गिरि-शिखर सागर आदि तट मठ गुफा में ।
रथ महल चैत्यालय सभा, स्वर्ग दुर्ग भू पथ तम्बु में ॥
नभ लता मण्डप आदि स्थल, रहे मोही परसमय ।
रत नहीं पाता सौख्य कण भी, मोह सब सुख विघातक ॥१७.६॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य मोह से मूढ़ और पर-समय में रत है, पर-पदार्थों को अपनानेवाला है; वह चाहे पुर, गाँव, वन, पर्वत के अग्र-भाग; समुद्र, नदी आदि के तट; मठ, गुफा, चैत्यालय, सभा, रथ, महल, किले, स्वर्ग, भूमि, मार्ग, आकाश, लता-मण्डप, तम्बू आदि स्थानों में से किसी स्थान पर निवास करे; उसे निराकुलतामय सुख का कण तक प्राप्त नहीं हो सकता; अर्थात् मोह और पर-द्रव्यों का प्रे निराकुलतामय सुख का बाधक है ।