+ इन्द्रिय-सुख की सुलभता -
निगोते गूथकीटे पशुनृपतिगणे भारवाहे किराते
सरोगे मुक्तरोगे धनवति विधने बाहनस्थे च पद्गे ।
युवादौ बारवृद्धे भवति हि खसुखं तेन किं यत् कदाचित्
सदा वा सर्वदैवैतदपि किल यतस्तन्न चाप्राप्तपूर्वं ॥7॥
निगोद में मल कीट पशु राजा, श्रमिक भील निरोगी ।
रोगी धनी निर्धन रथी, बाल वृद्ध यौवन पदाति ॥
देवादि में इंद्रिय सुख, उससे नहीं कुछ प्रयोजन ।
रहता सदा या नहिं रहे पर प्राप्त है बहु बार सब ॥१७.७॥
अन्वयार्थ : निगोदिया जीव, विष्टा का कीड़ा, पशु, राजा, भार वहन करनेवाले, भील, रोगी, नीरोगी, धनवान, निर्धन, सवारी पर घूनेवाले, पैदल चलनेवाले, युवा, बालक, वृद्ध और देवों में जो इंद्रियों से उत्पन्न सुख कभी होते हैं या कदाचित् सदा देखने में आता हो; उससे क्या प्रयोजन? अथवा वह सर्वदा ही बना रहे, तब भी क्या प्रयोजन? क्योंकि वह पहले कभी भी नहीं प्राप्त हुआ ऐसा निराकुलतामय सुख नहीं है (अर्थात् इंद्रियों से उत्पन्न सुख विनाशीक है और सुलभरूप से कहीं न कहीं, कुछ न कुछ अवश्य मिल जाता है; परन्तु निराकुलतामय सुख नित्य, अविनाशी है और आत्मा को विना विशुद्ध किए कभी प्राप्त नहीं हो सकता; इसलिए इन्द्रिय-सुख कैसा भी क्यों न हो, वह कभी निराकुलतामय सुख की तुलना नहीं कर सकता)