
व्याकुलः सविकल्पः स्यान्निर्विकल्पो निराकुलः ।
कर्मबंधोऽसुखं चाद्ये कर्माभावः सुखं परे ॥9॥
सविकल्प आकुलता सहित, है निराकुल निर्विकल्प ही ।
सविकल्प दुख बन्धनमई, भिन्न ज्ञान सुख निर्बन्ध ही ॥१७.९॥
अन्वयार्थ : जिस ज्ञान की मौजूदगी में आकुलता हो, वह ज्ञान सविकल्पक और जिसमें आकुलता न हो, वह ज्ञान निर्विकल्पक कहा जाता है । उनमें सविकल्प ज्ञान के होने पर कर्मों का बन्ध और दु:ख भोगना पड़ता है और निर्विकल्पक ज्ञान के होने पर कर्मों का अभाव और परम सुख प्राप्त होता है ।