+ अब अपनी इच्छा -
बहून् वारान् मया भुक्तं सविकल्पं सुखं ततः ।
तन्नापूर्वं निर्विकल्पे सुखेऽस्तीहा ततो मम ॥10॥
सविकल्प सुख बहुवार भोगा, अत: नव अद्भुत नहीं ।
अब मात्र इच्छा निर्विकल्पक, निराकुल निज सौख्य की ॥१७.१०॥
अन्वयार्थ : आकुलता के भण्डार इस सविकल्पक सुख का मैंने बहुत बार अनुभव किया है । जिस गति में गया हूँ, वहाँ मुझे सविकल्प ही सुख प्राप्त हुआ है; इसलिए वह मेरे लिए अपूर्व नहीं है; परन्तु निराकुलतामय, निर्विकल्पक सुख मुझे कभी प्राप्त नहीं हुआ; इसलिए उसी की प्राप्ति के लिए मेरी अत्यन्त इच्छा है; वह कब मिले - इस आशा से मेरा चित्त सदा भटकता फिरता है ।