+ राग से दु:ख और विराग से सुख -
ज्ञेयज्ञानं सरागेण चेतसा दुःखमंगिनः ।
निश्चयश्च विरागेण चेतसा सुखमेव तत् ॥11॥
हो सरागी मन जानता, जो ज्ञेय दुख हेतु हुए ।
हो विरागी मन जानता, वह सौख्य सुख हेतु हुए ॥१७.११॥
अन्वयार्थ : रागी, द्वेषी और मोही चित्त से पदार्थों का जो ज्ञान किया जाता है, वह दु:ख-स्वरूप है; उस ज्ञान से जीवों को दु:ख भोगना पड़ता है और वीतराग, वीतद्वेष और वीतमोह चित्त से पदार्थों का जो ज्ञान होता है; वह सुख-स्वरूप है; उस ज्ञान से सुख की प्राप्ति होती है ।