
चिंता दुःखं सुखं शांतिस्तस्या एतत्प्रतीयते ।
तच्छांतिर्जायते शुद्धचिद्रूपे लयतोऽचला ॥13॥
चिन्ता है दुख है सौख्य शान्ति, यह प्रतीति हो स्वयं ।
निज शुद्ध चिद्रूप में मगनता से प्रगट शान्ति अचल ॥१७.१३॥
अन्वयार्थ : जिस अचल शान्ति से संसार में यह मालू होता है कि यह चिंता है, यह दु:ख है, यह सुख और शान्ति है; वह इसी शुद्ध-चिद्रूप में लीनता प्राप्त करने से होती है । शुद्ध-चिद्रूप में लीनता प्राप्त किए विना चिन्ता, दु:ख आदि के अभाव के स्वरूप का ज्ञान नहीं हो सकता ।