
मुंच सर्वाणि कार्याणि संगं चान्यैश्च संगतिं ।
भो भव्य ! शुद्धचिद्रूपलये वांछास्ति ते यदि ॥14॥
सब छोड़ लौकिक कार्य, परिग्रह अन्य संगति भी सभी ।
हे भव्य! शुद्ध चिद्रूप में, दृढ़ लीनता चाहे यदि ॥१७.१४॥
अन्वयार्थ : हे भव्य! यदि तु शुद्ध-चिद्रूप में लीन होकर जल्दी मोक्ष प्राप्त करना चाहते हो तो तुम सांसारिक समस्त कार्य, बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रह और दूसरों का सहवास सर्वथा छोड़ दो ।