+ यथार्थ सुख -
इन्द्रियैश्च पदार्थानां स्वरूपं जानतोंऽगिनः ।
यो रागस्तत्सुखं द्वेषस्तद्दुःखं भ्रांतिजं भवेत् ॥16॥
यो रागादिविनिर्मुक्तः पदार्थानखिलानपि ।
जानन्निराकुलत्वं यत्तात्त्विकं तस्य तत्सुखं ॥17॥
नित इंद्रियों से पर पदार्थों, भाव को जाने वहीं ।
जो राग वह सुख द्वेष दुख, है महा भ्रान्ति जिन कही ॥१७.१६॥
रागादि विरहित विज्ञ जो, सब वस्तुओं को जानते ।
भी निराकुलतामय, वही सुख वास्तविक वे भोगते ॥१७.१७॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के द्वारा पदार्थों का स्वरूप जाननेवाले इस जीव का जो उनमें राग होता है, वह सुख और द्वेष होता है, वह दु:ख है - ऐसा मानना नितान्त भ्र है; किन्तु जो पुरुष राग, द्वेष आदि से रहित है, समस्त पदार्थों का जानकार है, उसके जो समस्त प्रकार की आकुलता का त्याग है, निराकुलता है, वही वास्तविक सुख है ।