
इंद्राणां सार्वभौमानां सर्वेषां भावनेशिनां ।
विकल्पसाधनैः सार्थैर्व्याकुलत्वात्सुखं कुतः ॥18॥
तात्त्विकं च सुखं तेषां ये मन्यंते ब्रुवंति च ।
एवं तेषामहं मन्ये महती भ्रांतिरुद्गता ॥19॥
नित इन्द्र चक्री भवन अधिपति, सब विकल्पों पूर्वक ।
इंद्रिय विषय से आकुलित, तब कहो कैसे उन्हें सुख? ॥१७.१८॥
उनके सुखों को वास्तविक, जो मानते कहते उन्हें ।
मैं मानता अति महा भ्रान्ति, प्रगट मोहासक्त वे ॥१७.१९॥
अन्वयार्थ : इन्द्र, चक्रवर्ती और भवनवासी देवों के स्वामियों को जितने इन्द्रियों के विषय होते हैं, वे विकल्पों से होते हैं । उन विकल्पों से सदा चित्त आकुलतामय रहता है; इसलिए वास्तविक सुख उन्हें कभी प्राप्त नहीं होता । जो पुरुष, उनके सुख को वास्तविक सुख समझते हैं और उस सुख की वास्तविक सुख में गणना करते हैं; मैं समझता हूँ उनकी यह भारी भूल है । वह सुख कभी वास्तविक सुख नहीं हो सकता ।