+ निराकुल सुख पाने की पात्रता -
विमुच्य रागादि निजं तु निर्जने
पदे स्थिरतानां सुखमत्र योगिनां ।
विवेकिनां शुद्धचिदात्मचेतसां
विदां यदा स्यान्न हि कस्यचित्तथा ॥20॥
रागादि तज निर्जन थलों में, सुथिर योगी विवेकी ।
शुद्धात्म वेदी विज्ञ को, जो सुख किसी को नहिं कभी ॥१७.२०॥
अन्वयार्थ : इसलिए जो योगि-गण बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रह का त्यागकर निरुपद्रव एकान्त स्थान में निवास करते हैं; विवेकी, हित-अहित के जानकार हैं, शुद्ध-चिद्रूप में रत हैं और विद्वान हैं, उन्हें ही यह निराकुलतामय सुख प्राप्त होता है; उनसे अन्य किसी भी मनुष्य को नहीं ।