
श्रुत्वा श्रद्धाय वाचा ग्रहणममपि दृढं चेतसा यो विधाय
कृत्वांतः स्थैर्यबुद्धया परमनुभवनं तल्लयं याति योगी ।
तस्य स्यात्कर्मनाशस्तदनु शिवपदं च क्रमेणेति शुद्ध-
चिद्रूपोऽहं हि सौख्यं स्वभवमिह सदासन्न भव्यस्य नूनं ॥1॥
'मैं शुद्ध चिद्रूप हूँ' श्रवण, श्रद्धान कर मन वचन से ।
सुदृढ़ ग्रहण कर अन्तरंग, पूर्ण स्थिर बुद्धि से ॥
उत्कृष्ट अनुभव पूर्वक, इसमें मगन हो योगि जो ।
उन निकट भवि के कर्म-क्षय, पश्चात् शिव पद प्राप्त हो ॥
इस भाँति क्रमश: अन्तरोन्मुखी विधि से निराकुल ।
स्वाधीन सौख्यमई दशा, प्रगटे सुनिश्चित मान यह ॥१८.१॥
अन्वयार्थ : जो योगी 'मैं शुद्ध-चिद्रूप हूँ' ऐसा भले प्रकार श्रवण और श्रद्धान कर, वचन और मन से उसे ही दृढ़रूप से धारण कर, अन्तरंग को स्थिरकर और उसे सर्व से पर/सर्वोत्तम जानकर उसका अनुभव और उसमें अनुराग करता है; वह आसन्न भव्य, बहुत जल्दी मोक्ष जानेवाला योगी, क्रम से समस्त कर्मों का नाश कर अतिशय विशुद्ध मोक्ष-मार्ग और निराकुलतामय आत्मिक सुख का लाभ प्राप्त करता है ।