+ उपदेश का क्रम -
गृहिभ्यो दीयते शिक्षा पूर्वं षट्कर्मपालने ।
व्रतांगीकरणे पश्चात्संयमग्रहणे ततः ॥2॥
यतिभ्यो दीयते शिक्षा पूर्वं संयमपालने ।
चिद्रूपचिंतने पश्चादयमुक्तो बुधैः क्रमः ॥3॥
पहले गृही को षट् करम, पालन की शिक्षा दें पुन: ।
व्रत ग्रहण उसके बाद, संयम ग्रहण में प्रवर्तना ॥१८.२॥
पर यती को पहले सुसंयम, पालने की सीख दें ।
पश्चात् चिद्रूप ध्यान की, ज्ञानी यही क्रम बताते ॥१८.३॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य गृहस्थ हैं, उन्हें पहले देव-पूजा आदि छह आवश्यक कर्मों को पालने की, पश्चात् व्रतों को धारण करने की और फिर संयम-ग्रहण करने की शिक्षा देनी चाहिए; परन्तु जो यति हैं, निर्ग्रन्थरूप धारण कर वन-वासी हो गए हैं, उन्हें सबसे पहले संयम पालने की और पीछे शुद्ध-चिद्रूप का ध्यान करने की शिक्षा देनी चाहिए - यह क्रम ज्ञानियों ने कहा है ।