+ कर्माभाव और तात्त्विक सुख युगपत् होता है -
युगपज्जायते कर्ममोचनं तात्त्विकं सुखं ।
लयाच्च शुद्धचिद्रूपे निर्विकल्पस्य योगिनः ॥5॥
हो निर्विकल्पक सुयोगी के, निजातम में लीनता ।
से प्रगट युगपत् कर्म क्षय, वास्तविक सुख यों जानना ॥१८.५॥
अन्वयार्थ : जो योगी निर्विकल्पक हैं, समस्त प्रकार की आकुलताओं से रहित हैं और शुद्ध-चिद्रूप में लीन हैं; उन्हें एक साथ समस्त कर्मों का नाश और तात्त्विक सुख प्राप्त हो जाता है ।