
भावान्मुक्तो भवेच्छुद्धचिद्रूपोहमीतिस्मृतेः ।
यद्यात्मा क्रमतो द्रव्यात्स कथं न विधीयते ॥8॥
'मैं शुद्ध चिद्रूप हूँ' सदा, इस ध्यान से भाव मोक्ष हो ।
तो नियम से क्रमश: इसी से, द्रव्य मुक्ति हो हि हो ॥१८.८॥
अन्वयार्थ : यह आत्मा 'मैं शुद्ध-चिद्रूप हूँ' - ऐसा स्मरण करते ही जब भाव-मुक्त हो जाता है, तब क्रम से द्रव्य-मुक्त तो अवश्य ही होगा ।