
क्षणे क्षणे विमुच्येत शुद्धचिद्रूपचिंतया ।
तदन्यचिंतया नूनं बध्येतैव न संशयः ॥9॥
निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान से, प्रतिक्षण करम खिरते रहें ।
संशय नहीं वे अन्य चिन्ता से सदा बँधते रहें ॥१८.९॥
अन्वयार्थ : यदि शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन किया जाएगा तो प्रति-क्षण कर्मों से मुक्ति होती चली जाएगी और यदि पर-पदार्थों का चिन्तन होगा तो प्रति-समय कर्म-बन्ध होता रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं ।