अयोगे मरणं कृत्वा भव्या यांति शिवालयं ।
मृत्वा देवगतिं यांति शेषेषु सप्तसु ध्रुवं ॥12॥
है अयोगी में मरण निश्चित, नित शिवालय प्राप्त हो ।
यदि शेष सातों में मरण तो, देव गति ही प्राप्त हो ॥१८.१२॥
अन्वयार्थ : अयोग-केवली नामक चौदहवें गुणस्थान से मरनेवाले जीव, मोक्ष जाते हैं और शेष सात गुणस्थानों से मरनेवाले, देव होते हैं ।