
शुद्धचिद्रूपसद्धयानं कृत्वा यांत्यधुना दिवं ।
तर्त्रेदियसुखं भुक्त्वा श्रुत्वा वाणीं जिनागतां ॥13॥
जिनालयेषु सर्वेषु गत्वा कृत्वार्चनादिकं ।
ततो लब्ध्वा नररत्वं च रत्नत्रय विभूषणं ॥14॥
शुद्धचिद्रूपसद्धयानबलात्कृत्वा विधिक्षयं ।
सिद्धस्थानं परिप्राप्य त्रैलोक्यशिखरे क्षणात् ॥15॥
साक्षाच्च शुद्धचिद्रूपा भूत्वात्यंतनिराकुलाः ।
तिष्ठंत्यनंतकालं ते गुणाष्टक समन्विताः ॥16॥
हैं अभी भी निज शुद्ध चिद्रूप, ध्यान कर पाते सुरग ।
वे वहाँ इंद्रिय सौख्य भोगें, सुनें वाणी जिनागत ॥१८.१३॥
सब जिनालय में जा करें, जिन पूजनादि वहाँ से ।
आ नरपना पा सत् रतनत्रय से सुशोभित नियम से ॥१८.१४॥
निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान बल से, कर करम क्षय सिद्ध पद ।
पा इक समय में ऋजुगति से, जा त्रिलोक शिखर अचल ॥१८.१५॥
साक्षात् शुद्ध चिद्रूप हो, नित निराकुल गुण आठ से ।
मण्डित अनन्तों गुणमई, रहते अनन्तों काल ये ॥१८.१६॥
अन्वयार्थ : इस समय भी जो जीव शुद्ध-चिद्रूप का ध्यान करनेवाले हैं, वे मरकर स्वर्ग जाते हैं और वहाँ भले प्रकार इन्द्रिय-जन्य सुखों को भोगकर, भगवान जिनेन्द्र के मुख से जिनवाणी श्रवण कर, समस्त जिन-मन्दिरों में जा और उनकी पूजन आदि कर, मनुष्य-भव व सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र को प्राप्त कर, शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान से समस्त कर्मों का क्षयकर सिद्ध-स्थान को प्राप्त होकर तीन लोक के शिखर पर जा विराजते हैं तथा वहाँ पर साक्षात् शुद्ध-चिद्रूप होकर अत्यन्त निराकुल और केवल-दर्शन, केवल-ज्ञान, अव्याबाधसुख आदि आठों गुणों से भूषित हो अनन्त काल पर्यन्त निवास करते हैं ।