
क्रमतः क्रमतो याति कीटिका शुकवत्फलं ।
नगस्थं स्वस्थितं ना च शुद्धचिद्रूपचिंतनं ॥17॥
ज्यों कीट क्रम क्रम से तरु पर, चड़ भखे फल कीरवत् ।
त्यों आत्म-स्थित शुद्ध-चिद्रूप, ध्यान कर सकता सतत ॥१८.१७॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कीड़ी क्रम-क्रम से धीरे-धीरे वृक्ष के ऊपर चड़कर शुक के समान फल का आस्वादन करती है; उसी प्रकार यह मनुष्य भी क्रम-क्रम से शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन करता है ।