
गुर्वादीनां च वाक्यानि श्रुत्वा शास्त्राण्यनेकशः ।
कृत्वाभ्यासं यदा याति तद्वि ध्यानं क्रमागतं ॥18॥
जिनेशागमनिर्यासमात्रं श्रुत्वा गुरोर्वचः ।
विनाभ्यासं यदा याति तद्ध्यानं चाक्रमागतं ॥19॥
क्रमागत ध्यान और अक्रमागत ध्यान को परिभाषित
सद्गुरु आदि के वचन, सुन विविध शास्त्रों का सदा ।
अभ्यास कर जब प्राप्त हो, तब ध्यान क्रमश: हो वहाँ ॥१८.१८॥
नित जो जिनागम सार को, गुरु वचन से सुन प्राप्त हो ।
अभ्यास बिन जब ध्यान, तो वह अक्रमागत जान लो ॥१८.१९॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, गुरु आदि के वचनों को भले प्रकार श्रवण कर और शास्त्रों का भले प्रकार अभ्यास कर शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन करता है, उसके क्रम से शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन, क्रमागत ध्यान कहा जाता है; किन्तु जो पुरुष भगवान जिनेन्द्र के शास्त्रों के तात्पर्य-मात्र को बतलानेवाले गुरु के वचनों को श्रवण कर अभ्यास नहीं करता, बारम्बार शास्त्रों का मनन-चिन्तन नहीं करता; उसके जो शुद्ध-चिद्रूप का ध्यान होता है, वह अक्रमागत ध्यान कहा जाता है ।