+ ग्रन्थकार ग्रन्थ-निर्माण का कारण -
न लाभमानकीर्त्यर्था कृता कृतिरियं मया ।
किंतु मे शुद्धचिद्रूपे प्रीतिः सेवात्रकारणं ॥20॥
यह जो कृति की नहीं मैंने, लाभ मान यशार्थ भी ।
है मात्र शुद्ध चिद्रूप में, प्रीति हुआ हेतु यही ॥१८.२०॥
अन्वयार्थ : अन्त में ग्रन्थकार ग्रन्थ के निर्माण का कारण बतलाते हैं कि यह जो मैंने ग्रन्थ बनाया है, वह किसी प्रकार के लाभ, मान या कीर्ति की इच्छा से नहीं बनाया; परन्तु शुद्ध-चिद्रूप में मेरा (जो) गाढ़ प्रे है, इसी कारण इसका निर्माण हुआ है ।