
जातः श्रीसकलादिकीर्तिमुनिपः श्रीमूलसंघेग्रणी –
स्तत्पट्टोदयपर्वते रविरभूद्भव्यांबुजानंदकृत् ।
विख्यातो भुवनादिकीर्तिरथ यस्तत्पादपंकजे रतः
तत्त्वज्ञानतरंगिणीं स कृतवानेतां हि चिद्भूषणः ॥21॥
श्री मूल संघ में मुख्य, श्री सकलादि कीर्ति मुनि हुए ।
उनके सुपट्टोदय गिरि पर, कीर्ति भुवनादि हुए ॥
भव्याम्बुजों को रविवत्, आनन्दकर पदकंज में ।
रत ज्ञानभूषण शिष्य कर्ता तत्त्वज्ञान-तरंगिणि के ॥१८.२१॥
अन्वयार्थ : मूल संघ के आचार्यों में अग्रणी, सर्वोत्तम विद्वान आचार्य सकलादिकीर्ति हुए । उनके पट्टरूपी उदयाचल पर सूर्य के समान भव्यरूपी कमलों को आनन्द प्रदान करनेवाले प्रसिद्ध भट्टारक भुवनादिकीर्ति हुए । उन्हीं के चरण-कमलों का भक्त मैं ज्ञानभूषण भट्टारक हूँ, जिसने कि इस तत्त्वज्ञान-तरंगिणी ग्रन्थ का निर्माण किया है ।