+ ग्रंथ के अभ्यास का फल -
क्रीडंति ये प्रविश्येनां तत्त्वज्ञानतरंगिणीं ।
ते स्वर्गादिसुखं प्राप्य सिद्धयंति तदनंतरं ॥22॥
जो तत्त्वज्ञान-तरंगिणी के, विषय को स्वीकारते ।
वे भोग देवादि सुखों को, सिद्ध होते नियम से ॥१८.२२॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव इस तत्त्वज्ञान-तरंगिणी (तत्त्व-ज्ञानरूपी नदी) में प्रवेशकर क्रीड़ा (अवगाहन) करेंगे; वे स्वर्ग आदि के सुखों को भोगकर मोक्ष-सुख को प्राप्त होंगे । स्वर्ग-सुख को भोगने के बाद उन्हें अवश्य मोक्ष-सुख की प्राप्ति होगी ।