+ अनाहत की आराधना से रहित व्यक्ति के दु:खों का वर्णन -
विलसदलसतातस्तीव्रकर्मोदयाद् वा,
सरलविमलनाली-रन्ध्रमप्राप्य लोक ।
अहह कथमसह्यं दु:खजाल विशालम्‌,
सहति महति नैवाचार्यमज्ञस्तदर्थम् ॥41॥
अन्वयार्थ : अत्यधिक प्रमादयुक्त आचरण करने से अथवा (पूर्वनिबद्ध पापकर्म) का उदय होने से यह प्राणी सरल और निर्मल नाडी के छिद्र को प्राप्त न करके अत्यन्त खेद की बात है (कि) किस तरह से प्रचुर दु:खों के समूह को सहन करता है । (किन्तु) उस (निर्मल नाडी के छिद्र को) प्राप्त करने के लिए आचार्य (योगशास्त्रीय गुरु) को अज्ञानी प्राणी महत्त्व नही देता है ।