
श्रवणयुगलमध्ये मस्तके वक्षसि स्वे,
भवति भवनमेवां भाषितानां त्रयाणाम ।
विपुलफलमिहैवोत्पद्यते यच्च तेभ्य,
तदपि श्रृणु मया त्यं कथ्यमानं हि तथ्यम् ॥47॥
अन्वयार्थ : दोनों कानों के बीच में, मस्तक में, अपने वक्षस्थल में -- इन तीनों ध्वनियों का निवास है। उनसे ही जो विपुल फल भी प्राप्त होता है उसे भी तुम मेरे द्वारा कथ्यमान तथ्य के रूप में सुनो ।