
भ्रमरसदृशकेशं मस्तकं दूरदृष्टि,
वपुरजरमरोगं मूलनादप्रसिद्धे ।
अणु-लघु-महिमाद्या सिद्धय स्युर्द्वितीयात्,
सुर-नर-खचरेशां सम्पदश्चान्यभेदात् ॥48॥
अन्वयार्थ : नाद की उत्कृष्ट-सिद्धि प्राप्त होने से भौरों के समान बालों वाला हो जाता है । दूर तक देखने मे समर्थ आँखे हो जाती हैं, वृद्धावस्था-रहित रोग-रहित हो जाता है। द्वितीय से अणिमा-लघिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती है और अन्य भेद की सिद्धि से देव, मनुष्य व खेचरों के इन्द्रों की सम्पत्तियाँ प्राप्त होती है ।