कर-शिरसि नितम्बे नाभिबिम्बे च कर्णे,
प्रभवति घनघोषाम्भोनिधेर्घोषतुल्य ।
विघटयति कपाट-द्वन्द्वमद्वन्द्वसिद्धा-
स्पद-घटितमघौघ-ध्वंसकोऽयं चतुर्थ ॥49॥
अन्वयार्थ : यह चौथा (समुद्रघोष नामक नाद) हाथ के अग्रभाग (हथेली) में, नितम्ब स्थल में, नाभि-प्रदेश में और कानों में उत्पन्न होता है। महान्‌ घोष (ध्वनि) वाले समुद्र की गर्जनात्मक ध्वनि से समानता रखने वाला होता है। (तथा) पापों के समूह का विनाशक (होता हुआ) अद्वैत (अद्वितीय) मुक्ति-धाम में लगे हुए (शुभाशुभकर्म रूप) दोनों द्वारों को उद्‌घाटित कर देता है।