
प्रकटित-निजरूपं घोषमाकर्ण्य रम्यम्,
परिहरतु नितान्तं विस्मयं हे यतीश !
कुरुत कुरुत यूयं योगयुक्तं स्वचित्तम्,
तृणजललवतुल्यै किं फलै क्षौद्रसिद्ध्यै ॥50॥
अन्वयार्थ : हे मुनीश्वर ! निजशुद्धात्मस्वरूप को प्रकट करने वाले रमणीय नाद को सुनकर अत्यधिक आश्चर्य करना छोड दो । तुम अपने को योग / समाधि की साधना में दत्तचित्त किये रहो, तृण जलबिन्दु के समान तुच्छ सिद्धि रूप फलों से क्या लाभ है ?