+ अनाहतनाद की आराधना के द्वारा मुक्तिमार्ग मे प्रवर्तमान -
सकलदृगयमेक: केवलज्ञानरूप,
विदधति पदमस्मिन्‌ साधव सिद्धिसिद्ध्यै ।
तदलममुमनूनं नादमाराध्य सम्यक्,
त्वमपि भव शुभात्मा सिद्धि-सीमन्तिनीश: ॥51॥
अन्वयार्थ : यह एक (अखण्ड) सर्वदर्शी केवलज्ञान रूप (जो निश्चय अनाहत है, उसमें) (रत्ननत्रय के आराधक) साधुजन / साधकगण (स्वात्मोपलब्धिरूप) सिद्धि की प्राप्ति के लिए पदार्पण करते हैं (अग्रसर होते हैं)। इसलिए (अन्य सांसारिक कार्यों को) छोडो, (और) इस परिपूर्ण (अनाहत) नाद की भलीभाँति आराधना करके (हे प्रभाकर भट्‌ट) तुम भी (मुक्ति की पात्रता युक्त) शुभात्मा होकर, सिद्धावस्थारूपी सुन्दरी के स्वामी हो जाओ।