
सकलदृगयमेक: केवलज्ञानरूप,
विदधति पदमस्मिन् साधव सिद्धिसिद्ध्यै ।
तदलममुमनूनं नादमाराध्य सम्यक्,
त्वमपि भव शुभात्मा सिद्धि-सीमन्तिनीश: ॥51॥
अन्वयार्थ : यह एक सर्वदर्शी केवलज्ञान रूप साधुजन / साधकगण सिद्धि की प्राप्ति के लिए पदार्पण करते हैं । इसलिए छोडो, इस परिपूर्ण नाद की भलीभाँति आराधना करके तुम भी शुभात्मा होकर, सिद्धावस्थारूपी सुन्दरी के स्वामी हो जाओ।