+ ज्योतिरूप अनाहतस्वरूप का निरूपण -
बहिरबहिरुदार-ज्योतिरुद्‌भासि-दीप:,
स्फुरति यदि तवायं नाभिपद्मे स्थितस्य ।
अपसरति तदानीं मोहघोरान्धकार,
चरणकरणदक्षो मोक्षलक्ष्मी-दिदृक्षो: ॥52॥
अन्वयार्थ : मुक्ति रूपी लक्ष्मी के दर्शनों का अभिलाषी नाभि-कमल में स्थित तुम्हारे यदि यह चरण (सहज-परमतत्त्व में अविचल स्थिति) रूप करण (परिणति) में समर्थ / निष्णात बाहर और अन्दर प्रकाशक दीपक (के समान) व्यापक (ज्ञान) ज्योति प्रादुर्भूत होती है तब मोहरूपी घोर अन्धकार विनष्ट हो जाता है ।