इति निगदितमेतद् देशमाश्रित्य किंचित्‌,
गुरुसमयनियोगात् प्रत्ययस्यापि हेतो: ।
परमपरमुदारज्ञानमानन्दतानम्,
विमलसकलमेकं सम्यगोक समस्ति ॥53॥
अन्वयार्थ : गुरुप्रदत्त उपदेश (आज्ञा) के कारण (दूरदृष्टि आदि यौगिक सिद्धियों की) प्रतीति होने के कारण से भी (गुरु के) उपदेश का आश्रय लेकर कुछ यह (पूर्वोक्त निरूपण) कहा गया है । एक अन्य निरूपण (आगे किया जाने वाला) है, वह, परम उत्कृष्ट है आनन्द को बढाने वाला है, निर्मल व परिपूर्ण है, सम्यक्त्व का निवासस्थान है, (और) अपार सम्यग्ज्ञान-स्वरूप (होने से) समीचीन है ।