+ मोह और कालवश उपदेश का नाश -
प्रथममुदितमुक्तेनादिदेवेन दिव्यम्,
तदनु गणधराद्यै साधुभिर्यद्‌ घृतञ्च ।
कथितमपि कथंचिन्नाधिगम्यं समोहै,
अधिगतमपि नश्यत्याशु सिद्-ध्या विनेह ॥54॥
अन्वयार्थ : जो (युग के प्रारम्भ में) सर्वप्रथम (प्रथम तीर्थंकर) आदिनाथ के द्वारा जिनवाणी के रूप से दिव्यध्वनि के रूप में प्रादुर्भूत हुआ था और उनके पश्चात्‌ गणधर देव आदि के द्वारा(तथा) मुनिवरों / आचार्यों के द्वारा धारणा में (सुरक्षित) रखा गया (वह उपदेश) किसी तरह कहे जाने पर भी मोहयुक्त प्राणियों के द्वारा (हृदय में उतारने या) समझने योग्य नहीं हो पाता है, (तथा यदि किसी प्रकार) समझ में आ भी जाये (तो) इस कलिकाल में वांछित सिद्धि के बिना शीघ्र नष्ट होता जा रहा है ।