
स्वर-निकर-विसर्ग-व्यञ्जनाद्यक्षरैर्यद्,
रहितमहितहीनं शाश्वतं मुक्तसंख्यम् ।
अरस - तिमिररूप-स्पर्श-गन्धाम्बु-वायु-
क्षिति-पवनसखाणु-स्थूल-दिक्चक्रवालम् ॥55॥
ज्वर-जनन-जराणां वेदना यत्र नास्ति,
परिभवति न मृत्युर्नागतिर्नोगतिर्वा ।
तदतिविशदचित्तै लभ्यते-अंगेऽपि तत्त्वम्,
गुरुगुण-गुरुपादाम्भोज-सेवाप्रसादात् ॥56॥
अन्वयार्थ : जो अकारादि स्वरों के समूह, विसर्ग, 'क' आदि व्यजनाक्षरों आदि से रहित है, अहितकारी विभाव-परिणामों से रहित है, अविनाशी है, संख्यातीत है; रस, अन्धकार, रूप, स्पर्श, गन्ध, जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, अणुता , दिशाओं के समूह से जो रहित है, जहाँ ज्वर, जन्म, वृद्धावस्था की वेदना नहीं है, मृत्यु का प्रभाव नहीं है, गति-आगति -- दोनों का जहाँ अभाव है, उस तत्त्व को श्रेष्ठ गुणों वाले गुरुजनों के चरण-कमलों की सेवा के प्रसाद से अत्यन्त निर्मल मन वालों को शरीर में भी प्राप्त हो जाता है ।