+ गुरु के उपदेश के बिना तत्त्व का परिज्ञान नहीं -
गिरि-गहनगुहाद्यारण्य-शून्यप्रदेश-
स्थितिकरणनिरोध-ध्यान-तीर्थोपसेवा-
प्रपठन-जप-होमैर्बह्मणो नास्ति सिद्धि,
मृगय तदपरं त्वं भो प्रकारं गुरुभ्य: ॥57॥
अन्वयार्थ : पर्वतों, उनकी गहन गुफाओ एवं जगल आदि के निर्जन प्रदेशों में कायोत्सर्ग (स्थिति), इन्द्रिय-निरोध, ध्यान (सरागी देवताओं का), तीर्थों के सेवन, (स्तोत्रादि के) पठन, जप, होम -- इनसे ब्रह्म (शुद्धात्म-तत्त्व) की सिद्धि नहीं होती है इसलिए हे शिष्य ! गुरुओं के पास से दूसरे तरीके की खोज करो ।