
दृगवगमनलक्ष्म स्वस्य तत्त्वं समन्ताद्,
गतमपि निजदेहे देहिभिर्नोपलक्ष्यम् ।
तदपि गृरुवचोभिर्बोध्यते तेन देव,
गुरुविगतत्त्वस्तत्त्वत: पूजनीय ॥58॥
अन्वयार्थ : दर्शन व ज्ञान चिह्न वाले निज परमात्म तत्त्व को अपने शरीर में समस्त अंशों में व्याप्त होने पर भी शरीरधारी प्राणियों द्वारा दृष्टिगोचर / अनुभूतिगम्य नहीं हो पाता है । वह भी सद्गुरु के उपदेशों से ज्ञात हो जाता है । इस कारण से तत्त्वज्ञानी सद्गुरुदेव यथार्थत: पूजनीय हैं ।