
दृगवगमनवृत्त - स्वस्वरूपे प्रविष्ट:,
वृजति जलधिकल्पं ब्रह्म गम्भीरभावम् ।
त्वमपि सुनय ! मत्त्वा मद्वच सारमस्मिन्,
भव भवसि भवान्तस्थायिधामाधिधाम ॥60॥
अन्वयार्थ : दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप निज स्वरूप में अंतरंग स्थिति प्राप्त कर अत्यन्त गम्भीर समुद्र के समान निर्विकल्प आत्मतत्त्व को प्राप्त करता है । हे नय के ज्ञानी! तुम भी मेरे वचनों के निष्कर्ष को समझकर हो जाओ भव भ्रमण का अन्त होने पर प्राप्त होनेवाले शाश्वत मुक्तिधाम के अधिपति हो जाओ ।