+ अस्थिर मन दोषयुक्त -
यदि चलति कथञ्चिन्मानसं स्वस्वरूपाद्,
भ्रमति बहिरतस्ते सर्वदोषप्रसंग: ।
तदनवरतमन्तर्मग्न संविग्निचित्त:,
भव भवसि भवान्तस्थायिधामाधिपस्त्वम्‌ ॥61॥
अन्वयार्थ : अगर किसी कारणवश (तुम्हारा) मन / उपयोग अपने निज (शुद्धात्म) स्वरूप से चलायमान हो जाता है, (और) बाहर (विषयों में) भटकता है (तो) अत: उक्त कारण से तुम्हारे सभी दोषों का प्रसंग आ जाता है । तो निरन्तर अन्तर्लीनता को प्राप्त संवेग-युक्त चित्त वाले हो जाओ, (जिससे) तुम संसार के विनाश से स्थिरता को प्राप्त (मोक्षरूपी) धाम के स्वामी हो जाओगे ।